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Sunday, December 4, 2011

मेरा कुत्ता मुझपर ही भौंकता है


मेरा कुत्ता मुझपर ही भौंकता है
मेरे हर आहट पर चौंकता है
कटकटाता है, गुर्गुराता है
जबड़े को भींच, लाल आँखें दिखाता है
उसके सफ़ेद नुकीले दांतों में मैं अपने
मांस का टुकड़े देखता हूँ
अपनी अंतड़ियों को काट-काट
उसकी ओर फेंकता हूँ
मेरे आस्तित्व को मिटाने के लिए
अपनी सारी उर्जा झोंकता है
मेरा कुत्ता ही अब मेरा मालिक है
मुझ पर भौंकता है

लेकिन जब अहम की भूख
सांझ होते ही उसके अंतड़ियों में झुलसती है
मेरे आस्तित्व में रोटी की गंध पा
उसे मेरी परछाईं भी भली लगती है
मेरे पैरों पर पसर जाता है
कातर आँखों में अपनी दीनता दिखलाता है
मैं फिर एक रोटी के टुकड़े को
उसकी ओर फेंकता हूँ
दिनभर उसके दीये हुए
जख्मों को सहेजता हूँ
चलो, सुबह का भुला सांझ को घर आ गया
मेरे मालिकपन को नया बल आ गया
लेकिन सुबह के साथ ही
मेरे मालिकपन का अवसान हुआ
कल जिसने दूम हिलाई थी
आज फिर से
मेरे मौत का फरमान हुआ
अब तो मेरे हर सांस पर वो चौंकता है
मुझे मिटाने के लिए सस्वर भौंकता है

Tuesday, November 29, 2011

लंगड़े कुत्ते का भाषण

बड़े-बड़े दरबारों में दुम हिलाया है
मालिकों के मलाईदार जूठे को खाया है
भौंक-भौंक कर किया कपालभाति
कभी लेट कर किया वज्रासन
लंगड़े कुत्ते का भाषण


देश दुनिया घूम कर आया है
पश्चिम में पूरब ढूंढ कर आया है
साधू की तरह ज्ञानी हो गया
मांस भक्षण में भी गो ग्रासन
लंगड़े कुत्ते का भाषण



दो चार कुत्तों को चेला है बनाया
चौराहे पर भौंक जयकार मनाया
मुहल्ले की बिल्लियों को हड़काकर
मजबूत कर रहा अपना शासन
लंगड़े कुत्ते का भाषण



अपने लंगड़ेपन को खद्दर में छुपाया

सफ़ेद चोले में मन के कालेपन को छुपाया
गांधी-नेहरु की बातों का गुढ़ सार
चौपाल लगा सस्वर करता उच्चारण
लंगड़े कुत्ते का भाषण



प्रजातांत्रिक कुत्ता है,साम्राज्यवादी हो गया
देशभक्त का चोला फेंक अवसरवादी हो गया
असंसदीय बातों को संसद में भौंक भौंक
दूसरे कुत्तों को सिखा रहा अनुशासन
लंगड़े कुत्ते का भाषण

Monday, November 28, 2011

कुत्ते हैं आवाम का

(आज देश की हालत ये है कि हर नुक्कड़ पर के आवारा दोपाये अपने आपको नेता समझ बैठे हैं, देश के शीर्ष भवन में बैठ ये विभिन्न सुरों में भौंकते हैं इस तस्वीर को देश समझें और टूटते झोपडी को देश का संसद...)
इस कविता/व्यंग्य का भाव दोपायों के लिए है चौपायों से क्षमाप्रार्थी हूँ उनकी इस बेइज्जती के लिए... ~शशि



तस्वीर : फ्लिकर डाट नेट

हाँ ! यहाँ भी कुत्ते भौंकते हैं
हर समस्या पर चौंकते हैं,
साम्यवादी कुत्ते हैं,
परम्परावादी कुत्ते हैं
अन्दर कि बात यही है
अवसरवादी कुत्ते हैं
इनमे भी सगोत्रीय की जंग है
यहाँ भी वर्णभेद का रंग है
कबीरा भी था कुतिया राम का
हम भी कुत्ते हैं आवाम का
हम भी समस्याओं पर चौंकते हैं
जी जान लगाकर एक सुर में भौंकते हैं
~शशि रंजन मिश्र (२३/०२/२०११)